Monday, September 14, 2009

मैं रानी हूं...

मैं रानी हूं। कभी अपने राजा की रानी थी, लेकिन अब अपने राजा बेटों की रानी मां हूं। मैंने जिंदगी में कई ठोकरें खायीं। हर बार उठ खड़ी हुई। अब एक बीड़ा उठाया है। उसे भी पूरा करूंगी। मैं वह पथिक हूं, जिसकी डगर पर कांटे बिछे हैं, लेकिन कांटों का कोई खौफ नहीं। पांव में चुभेंगे, निकाल फेकूंगी। कब तक चुभेंगे। कभी न कभी वे खत्म होंगे और मैं अपनी मंजिल को छू लूंगी। फिर वह चुप होती है। लंबी सांस लेती है। सिर पर पल्लू डालती है और एक फीकी मुस्कान के साथ पूछती है- मेरी कामना पूरी होगी न...।
मैं उसके बिंदास अंदाज पर खामोश हूं। उसके सवाल का जवाब देने के बदले पूछ बैठता हूं तुम सोनागाछी कैसे पुहंच गई? सोनागाछी यानी वेश्याओं की मंडी। देह व्यापार के लिए देश- दुनिया में बदनाम। इस सवाल पर तत्काल बोलने की जगह एक लंबी सांस और पहले सवाल के बदले सवाल- क्या करेंगे जानकर? लेकिन कुरेदने पर बोल पड़ी। मैं ने पहले ही कहा न कि कभी मैं अपने राजा की रानी थी। चौदहवें साल में ही पड़ोसी लड़के से इश्क हुआ। दीन दुनिया से बेखबर उसके प्यार में खोई रही। इश्क और मुश्क छिपता नहीं। मेरे प्यार की कहानी भी नहीं छिपी। मेरे घर से बाहर निकलने पर बंदिश लगी, लेकिन कच्ची उम्र के प्यार में मैं तो पागल बन बैठी थी। मां- बाप को झांसा देकर घर से निकल भागी। लेकिन मेरा दुर्भाग्य... पति कमजोर निकला। नशे का आदी था।
मैं प्रेम दीवानी उसकी इस कमजोरी को भांप नहीं सकी, लेकिन तीन महीने बाद ही उसकी असलियत सामने आ गई। नशे के लिए उसने मुझे अपने साथी के हवाले कर दिया। मैं चिल्लाती रही, लेकिन उस बेवफा को रहम नहीं आया। गुस्से से मैंने उसे छोड़ दिया। बाबुल का घर पहले ही छूट चुका था। सो, रोजी- रोटी के लिए पार्क स्ट्रीट के एक तथाकथित कुलीन परिवार में दाई का काम करने लगी। अभी उस घर का कामकाज करते चार दिन भी नहीं बीते थे कि मालकिन के घर में नहींं रहने का फायदा (?) उसके जवान बेटे ने उठा लिया। मेरी इज्जत एक बार फिर उतारी गई। मैंने शिकायत की तो मालकिन ने बेटे को सबक सिखाने के बदले मुझ पर सामान चोरी करने का आरोप जड़ दिया और काम से निकाल दिया। औरत की जवानी बहुत घातक है बाबू। मैंने अपने तेइस वर्ष की जिंदगी में भेडिय़ों के कई रूप देखे। उनके लिए जवान औरत का मतलब सिर्फ भोग्या है। मैंने देखा जब इज्जत उतर ही रही है तो क्यों ने खुद ही इस बाजार में बैठ जाऊं। और आठ साल पहले सोनागाछी पहुंच गई।
रानी के चेहरे के भाव में अब न तो उदासी है और न ही गम की निशानी। अब शोख अंदाज है। मुस्कराती है और कहती है- शुरू में यहां भी दिक्कत आई। दलालों ने पैसे छीने। पुलिसवाले हफ्ता वसूलते रहे। लेकिन मैं भी कहां हारने वाली थी। आठवीं तक पढ़ी होने के कारण अपने अधिकार का ज्ञान था, सो पहुंच गई दूर्बार (सोनागाछी में सेक्स वर्करों के उत्थान के लिए संचालित संस्था) की भारती दीदी के पास। यहां मिली सहायता ने जिंदगी को सरल बना दिया।
रानी अब स्त्री सत्ता की पैरोकार दिखनी लगी। अब उसकी बोली में ठसक, दृढ़ता और जूझने का अंदाज था। बाबू जी, अब मैंने समाज को यह बताने की ठान ली है कि वेश्या नाली के कीड़े- मकोड़े की तरह नहीं है। समाज का हिस्सा और उसकी जरूरत है। मेरी लड़ाई अब मेरी नहीं मेरे पूरे समाज की है। मैंं चाहती हूं कि वेश्याओं के बच्चे यह कहने मे शर्म नहीं करें कि वह रंडी की औलाद हैं। मैं अपने दोनों बच्चों को यही बता रही हूं।
रानी कहती है - जीवन का लक्ष्य तय कर चुकी हूं। क्या मेरा फैसला गलत है? मेरा जवाब- कतई नहीं। और फिर उसके चेहरे पर वही मुस्कान, वही अंदाज, वही लटका- झटका। धीरे से सोनागाझी की टेढ़ी- मेढ़ी गलियों को पार कर आंखों से ओझल हो जाती है और अपने पीछे छोड़ जाती है एक सवाल...आखिर उन जैसी स्त्रियों के दर्द का हिस्सा कैसे बना जाए?

कुमार भवानंद