वाकई बुंदेलखंड पिछड़ा है। विकास में ही नहीं लिंगानुपात में भारी अंतर भी इस क्षेत्र के पिछड़ेपन का परिचायक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में चाइल्ड सेक्स रेशियो पर किया गया अध्ययन चौंकाने वाला है। हम जब सौवें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का धूमधाम से आयोजन करने में जुटे हैं, तब इस क्षेत्र में प्रति एक हजार बच्चे की तुलना में महज 906 बच्चियां हैं। जेंडर इम्बेलेंस इन बुंदेलखंड -ए डाक्टरनल स्टडी में इस तथ्य का खुलासा किया गया है।
अध्ययन दल की यह रिपोर्ट भविष्य के खतरे को दर्शाने के लिए काफी हैं। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में फैले बुंदेलखंड क्षेत्र में चाइल्ड सेक्स रेशियो इन दोनों प्रदेशों से भी कम है। दरअसल, गिरते लिंगानुपात की मुख्य वजह कन्या भ्रूण हत्या ही है।
रिपोर्ट की मानें तो बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी जिले में तो प्रति हजार बच्चों पर 886 बच्चियां हैं। इसी तरह प्रति हजार बच्चे पर जालौन में 889 बच्चियां, चित्रकूट में 928, बांदा में 917, महोबा में 901, हमीरपुर में 903, ललितपुर में 930 बच्चियां हैं, जबकि मप्र के बुंदेलखंड क्षेत्र के दतिया में 874, छतरपुर में 916, टीकमगढ़ में 915, दमोह में 930, सागर में 931 व पन्ना में 931 बच्चियां हैं। गौर करने लायक तथ्य यह है कि इस समय यूपी में प्रति हजार पुरुष पर 916 व मध्यप्रदेश में 932 महिलाएं हैं।
अध्ययन दल के मुताबिक शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिंगानुपात के अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति शहरी क्षेत्र की तुलना में ठीक है। बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्र में प्रति हजार बच्चे पर 911 एवं शहरी क्षेत्र में 888 बच्चियां हैं। यानी, शहरी आबादी ग्रामीणों की तुलना में अधिक खुदगर्ज है। उन्हें समाज और देश की चिंता नहीं, बल्कि अपने वंश बेल के फलने और फूलने की अधिक चिंता है।
- कुमार भवानंद
Monday, March 8, 2010
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