बुंदेलखंड के किसानों की दशा सुधारने को अभियान चलाएंगे पालेकर
कुमार भवानंद
झांसी। सामान्य कदकाठी, शरीर पर खादी का कुरता - पायजामा और पैर में हवाई चप्पल। साधारण व्यक्तित्व वाले इस शख्स के सपने किसी युग प्रवर्तक सरीखे हैं। वह बगैर किसी सरकारी सहायता के खेती- किसानी की दशा - दिशा बदलने को कटिबद्ध तो हैं ही, समाज में व्याप्त बुराइयों को भी खत्म करने में जुटे हैं। जी हां, बात जीरो बजट की खेती के जनक सुभाष पालेकर की हो रही है। वह शुक्रवार को नगर में आयोजित एक कार्यशाला में हिस्सा लेने आए थे। आमतौर पर सरकारी सहायता से गरीबी और बेरोजगारी मिटाने की बात करने वालों से इतर श्री पालेकर जनसहयोग और जनजागृति के जरिए समाज की इस सबसे बड़ी समस्या से जूझने की बात करते हैं। प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके बुंदेलखंड के किसानों की बदतर दशा को देखते हुए उन्होंने अब देश के अन्य स्थानों पर चलाए जा रहे अपने अभियान की कड़ी में इस क्षेत्र को भी जोड़ लिया है। युवाओं के बूते अगले पांच साल में इस क्षेत्र के सत्रह जिलों में खेती- किसानी को नया रूप देने की उनकी तैयारी तो है ही, वह यहां व्याप्त शराब, गुटखा, तंबाकू सेवन करने वालों को जागृत कर उन्हें इनकी खामियां भी बताएंगे। अपने जीवन के 62 वसंत देख चुके पालेकर कहते हैं कि रासायनिक खाद और संकर बीज ने हमारी खेती को पटरी से उतार दिया है। जीरो बजट की खेती के जरिए हम लोगों को बताना चाहते हैं कि देसी बीज और पशुओं के गोबर से तैयार खाद सर्वश्रेष्ठ है। इसके जरिए हम ज्यादा उत्पादन कर सकते हैं। कृषि विज्ञान की पढ़ाई करने वाले पालेकर के मुताबिक यह सब उन्होंने अपने अनुभवों से हासिल किया है। कालेज की पढ़ाई के दिनों में प्रोजेक्ट केतहत जनजाति क्षेत्र में प्राकृतिक खाद पर हरे- भरे पेड़- पौधे और अनाज उगते देखे थे। बाद में खुद जब खेती की तो रासायनिक खाद को तरजीह दी, लेकिन दस वर्ष बाद उसके नतीजे बहुत खराब आए। यही, उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट रहा। पिछले 33 वर्षों से वह देश भर घूम- घूम कर लोगों को प्राकृतिक खेती के फायदे बता रहे हैं। अब तो न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी लोग जीरो बजट की खेती को अपना रहे हैं। बकौल पालेकर, उन्होंने बुंदेलखंड के अपने साथियों को हर मंडल से एक गांव चुनने को कहा है। इस गांव से दस किसान का चयन कर उन्हें जीरो बजट खेती (देसी बीज, गोबर की खाद से खेती) के लिए प्रेरित किया जाएगा। फसल उत्पादन के बाद पूरे मंडल के जागरूक किसानों को इन मॉडल गांवों में ले जाकर रासायनिक खेती और प्राकृतिक खेती में अंतर और लाभ के संबंध में जानकारी दी जाएगी। उनकी मानें तो कम पानी वाले इस क्षेत्र में जीरो बजट की खेती किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने वाली साबित होगी। दो महीने के भीतर गांव और किसानों के चयन का काम पूरा कर लिया जाएगा। हर जिले में एक- एक वर्कशाप का आयोजन होगा, ताकि किसानों को तकनीक के संबंध में पूरी जानकारी दी जा सके। चयनित किसानों को वह देश भर से इकट्ठा किए गए देसी बीज भी उपलब्ध कराएंगे। वह कहते हैं कि सिर्फ खेती की बात मत कीजिए, स्वमूत्र के जरिए स्वास्थ्य रक्षा की जानकारी भी दी जाएगी। पिछले तीस वर्ष से बगैर साबुन के स्नान करने वाले पालेकर का दावा है कि शरीर की स्वच्छता के लिए साबुन की कोई जरूरत नहीं है। शेविंग के लिए क्रीम की जगह सिर्फ पानी का इस्तेमाल ही काफी है। वह कहते हैं कि उनका सिर्फ एक उद्देश्य है देश का पैसा देश में, गांव का पैसा गांव में रहना चाहिए।