Monday, December 14, 2015

...Pal Pal ki Dosti

...Pal Pal ki Dosti ka Waada hai
Apna Pan Kuch itna ziyada hai
Na Sochna k Bhool Jayein gay Hum Aap ko
Jab Tak Zindagi hai Satane ka Full Irada Ha

689 वर्ष से जारी है मिथिला में विवाह पूर्व पंजीकरण




689 वर्ष से जारी है मिथिला में विवाह पूर्व पंजीकरण
सब हेड : मैथिल, श्रोत्रिय ब्राह्मण व कर्ण कायस्थ पंजीकारों से लेते हैं शादी से पहले अनुमति
पॉइंटर
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- पंजी में दर्ज वंशावली से तय होता वर-वधू पक्ष में नहीं है कोई सीधा संबंध
- माता पक्ष से छह और पिता पक्ष से सात पीढ़ी का अंतर जरूरी
- समान गुणसूत्र युक्त माता-पिता की संतति हो जाते रोगों के शिकार
- 1326 . से चली आ रही सिद्धांत (पंजीकरण) की परंपरा
- मिथिला नरेश महाराजा हरि सिंह देव ने शुरू कराई थी व्यवस्था
- सबसे पुरानी वंशावली मांड़र मूल के ब्राह्मणों का है पंजीबद्ध
- महान गणितज्ञ आर्यभट्ट भी हैं इसी मांड़र मूल (कश्यप गोत्र) के
- 450 . से 2009 तक जन्म लेने वालों की जानकारी से युक्त पुस्तक का प्रकाशन

कुमार भवानंद
मुजफ्फरपुर। आज भले ही विवाह से पूर्व एचआईवी/एड्स की जांच को लेकर वर-वधू पक्ष के लोग जागरूक दिखते हों, लेकिन मिथिला (उत्तर बिहार) निरोग संतान को लेकर पहले से ही सजग रहा है। विज्ञान बताता है कि समान गुणसूत्र (क्रोमोसोम) के माता-पिता की संतति आंख, चर्म, विकृतांग, रक्तदोष, मधुमेह, गठिया, चेहरे में विकृति व मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। अनजाने में ऐसी बीमारियों से युक्त संतान को जन्म देने से बचने के लिए इस क्षेत्र के मैथिल व श्रोत्रिय ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ परिवार के बेटे-बेटियों का विवाह पिता पक्ष से सात और माता पक्ष से छह पीढ़ियों की दूरी होने पर ही तय होती है। इसका निर्धारण यहां के पंजीकार करते हैं, जिनके पास उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी जानकारी होती है। पंजीकार द्वारा सिद्धांत पत्र (रजिस्ट्रेशन) दिए जाने के बाद ही विवाह मंडप सजता है।

इस तरह शुरू हुई थी व्यवस्था
पंजीकार विद्यानंद झा (मोहनजी) के मुताबिक 1326 . में मिथिला के राजा महाराजा हरि सिंह देव कर्नाटवंशी ने अपने ही एक मंत्री के अनजाने में दूर के रिश्ते की बहन से हुई शादी को लेकर उठे विवाद के बाद तय किया कि हर व्यक्ति की वंशावली तैयार हो, ताकि ऐसी स्थिति पैदा ही न हो। महाराजा के आदेश पर मधुबनी जिले के जमसम (पंडौल) में विश्वचक्र सम्मेलन हुआ। पहले पंजीकार बने गुणाकर झा। अलग-अलग स्थानों के लोगों ने उन्हें अपने पूर्वजों के संबंध में जानकारी दी। सर्वाधिक जानकारी मिली मध्यप्रदेश से जुड़े कश्यप गोत्रीय मांड़र मूल के ब्राह्मणों की। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट भी इसी मूल के थे। 

तिरहुताक्षर में लिखी पांडुलिपि से ग्रंथ तैयार
पहले पंजीकार गुणाकर झा के वंशज पूर्णिया निवासी पंजीकार विद्यानंद झा ने गजेंद्र ठाकुर और नागेंद्र कुमार झा के सहयोग से 450 . से 2009 तक मिथिला क्षेत्र के विभिन्न जिलों के ब्राह्मणों की वंशावली का वर्णन जीनियोलॉजिकल मैपिंग नामक पुस्तक में किया है। झा बताते हैं कि उनके पिता पंजीकार स्व. मोदानंद झा ने तिरहुता लिपि में लिखी पांडुलिपि उन्हें दी थी। समय के साथ पांडुलिपि खराब होने लगी थी। ऐसे में इतिहास मिटने का खतरा पैदा हो गया था। इसे देखते हुए उन्होंने अपने यजमानों (मिथिला के ब्राह्मणों) के आर्थिक सहयोग से इसे प्रकाशित करने का फैसला लिया।

पंजीकारों की लंबी फेहरिस्त है यहां
पंजीकार मोहनजी बताते हैं कि मिथिला में कई और पंजीकार भी हैं, खास कर दरभंगा और मधुबनी जिले में। सौराठ के कन्हैया जी, प्रो. शंकर दत्त मिश्र, विनोदानंद झा, ककरौल के शक्ति नंदन झा सहित कई अन्य भी सिद्धांत लिखते हैं। 

सौराठ में लगती है दूल्हों की सभा
मधुबनी जिले के सौराठ में आषाढ़ माह में लगने वाली दूल्हों की सभा में पंजीकारों की अहम भूमिका होती है। कई बार पंजीकार वर- वधू पक्ष के लोगों को सही जानकारी देकर संबंधों की बुनियाद डालने में उत्प्रेरक का काम करते हैं।

सौराठ सभा की यह थी पहचान
विवाह योग्य बिटिया के लिए योग्य वर की तलाश करने हर वर्ष अषाढ़ महीने में सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। पहले के मुकाबले यहां दूल्हों की वैसी भीड़ नहीं उमड़ती। दरअसल, कई बार झूठी जानकारी देकर विवाह करने का मामला सामने आने के कारण इस सभा का अब वैसा क्रेज नहीं रह गया है।

Sunday, November 8, 2015

उत्तर बिहार के वोटरों को झुनझुना समझने की भूल दिग्गजों पर पड़ी भारी


उत्तर बिहार के वोटरों को झुनझुना समझने की भूल दिग्गजों पर पड़ी भारी




दिग्गज रमई का 10 वी बार विधानसभा पहुंचने का सपना टूटा, मनोज भी मुंह के बल गिरे
-    चुनाव के मौके पर पाला बदलने वालों की भी झोली रही खाली
-    पूर्व मंत्री नीतीश मिश्रा को अति आत्मविश्वास ले डूबा

कुमार भवानंद
मुजफ्फरपुर। उत्तर बिहार के लोगों ने वोट के जरिए यह साफ कर दिया है कि वह सिर्फ झुनझुना नहीं हैं कि जब और जिस तरह उन्हें बजाया जा सकता है। अपनी उपेक्षा को वह बर्दाश्त नहीं कर सकते। यही वजह रही कि नीतीश सरकार के दो मंत्रियों को धूल चटाने में उन्होंने रत्ती भर भी संकोच नहीं किया, तो एनडीए को भी सबक सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछली विधानसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व करने वाले कई विधायक पराजय झेलने को विवश हुए। वोटरों के तीखे मूड का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि बोचहां और कांटी में दलीय प्रत्याशियों की जगह उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशियों को तरजीह दी।
पराजय झेलने वाले नीतीश सरकार के दो मंत्रियों में से एक रमई राम अपने साढ़े चार दशक के चुनावी सफर में तीसरी बार पराजित हुए। नौ बार उन्होंने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। यह अलग बात है कि इस दौर में उन्होंने कई बार अपनी दलीय निष्ठा बदली। उनकी धमक का आकलन इससे होता था कि बोचहां से नामांकन करते ही लोग मान लेते थे कि रमई का रथ अब जीत के द्वार को वरण करने के बाद ही थमेगा। नीतीश के दूसरे मंत्री मनोज कुशवाहा भी अबकी मुंह के बल गिरे। लगातार तीन बार चुनाव जीत चुके कुशवाहा ने 2010 के चुनाव से सबक नहीं लिया। तब वह महज 1.21फीसदी अधिक वोट पाकर जीतने में सफल रहे थे। बाजपट्‌टी से मंत्री रंजू गीता व सरायरंजन से मंत्री विजय कुमार चौधरी जरूर जीतने में सफल रहे। दोनों को ही अपने क्षेत्र में विकास परक योजना लाने का लाभ मिला।  नीतीश सरकार और फिर हम के हमसफर बन कर भाजपा के खाते से टिकट हासिल कर चुनाव लड़ने वाले पूर्व मंत्री नीतीश मिश्रा झंझारपुर से अपनी परंपरागत सीट को बचाने में विफल रहे। नीतीश मिश्रा को अति आत्मविश्वास यहां ले डूबा। जदयू से निकल कर हम का हाथ थामने वाले पूर्व मंत्री शाहिद अली खां भी सुरसंड के चुनावी जंग में मात खा गए। नीतीश सरकार में 2005 में मंत्री रह चुके हम प्रत्याशी निवर्तमान विधायक अजीत कुमार कांटी से अपनी सीट नहीं बचा पाए। यहां के लोगों ने निर्दलीय प्रत्याशी अशोक कुमार चौधरी को विधानसभा पहुंचा कर एक तरह से अजीत को यह एहसास कराया है कि वह उनके पिछलग्गु बनने को तैयार नहीं हैं।       
चुनाव पूर्व माना जा रहा था कि यह इलाका एनडीए के मुफीद रहेगा, लेकिन चुनाव परिणाम इससे इतर रहा। मुजफ्फरपुर में बीजेपी की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी, पर परिणाम कुछ और ही कह रहा है। मुजफ्फरपुर शहर और पारू सीट ही पार्टी बचा पाई। कुढ़नी के रूप में भाजपा के खाते में नई सीट आई, जबकि औराई और गायघाट सीट भाजपा के हाथ से निकल गई। ऐन चुनाव के मौके पर मीनापुर में जदयू से भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायक दिनेश कुशवाहा के पुत्र अजय कुमार को मैदान में उतारना भाजपा को भारी पड़ा। वहीं, बरूराज में राजद का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए ब्रजकिशोर सिंह के पुत्र अरुण कुमार को टिकट देना भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा। नतीजा, वह हार गए।
पूरे चुनाव परिणाम पर गौर करें तो यह साफ हो गया है कि वोटरों का मिजाज ठीक- ठीक पढ़ने में हर दल विफल रहा।