Sunday, November 8, 2015
उत्तर बिहार के वोटरों को झुनझुना समझने की भूल दिग्गजों पर पड़ी भारी
दिग्गज रमई का 10 वी बार विधानसभा पहुंचने का सपना टूटा, मनोज भी मुंह
के बल गिरे
- चुनाव के मौके पर पाला बदलने
वालों की भी झोली रही खाली
- पूर्व मंत्री नीतीश मिश्रा को
अति आत्मविश्वास ले डूबा
कुमार भवानंद
मुजफ्फरपुर। उत्तर बिहार के लोगों ने वोट के जरिए यह साफ कर दिया है
कि वह सिर्फ झुनझुना नहीं हैं कि जब और जिस तरह उन्हें बजाया जा सकता है। अपनी
उपेक्षा को वह बर्दाश्त नहीं कर सकते। यही वजह रही कि नीतीश सरकार के दो मंत्रियों
को धूल चटाने में उन्होंने रत्ती भर भी संकोच नहीं किया, तो एनडीए को भी
सबक सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछली विधानसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व करने
वाले कई विधायक पराजय झेलने को विवश हुए। वोटरों के तीखे मूड का अंदाजा इससे भी
लगाया जा सकता है कि बोचहां और कांटी में दलीय प्रत्याशियों की जगह उन्होंने
निर्दलीय प्रत्याशियों को तरजीह दी।
पराजय झेलने वाले नीतीश सरकार के दो मंत्रियों में से एक रमई राम
अपने साढ़े चार दशक के चुनावी सफर में तीसरी बार पराजित हुए। नौ बार उन्होंने इस क्षेत्र का
प्रतिनिधित्व किया। यह अलग बात है कि इस दौर में उन्होंने कई बार अपनी दलीय निष्ठा
बदली। उनकी धमक का आकलन इससे होता था कि बोचहां से नामांकन करते ही लोग मान लेते
थे कि रमई का रथ अब जीत के द्वार को वरण करने के बाद ही थमेगा। नीतीश के दूसरे
मंत्री मनोज कुशवाहा भी अबकी मुंह के बल गिरे। लगातार तीन बार चुनाव जीत चुके
कुशवाहा ने 2010 के चुनाव से सबक नहीं लिया। तब वह महज 1.21फीसदी
अधिक वोट पाकर जीतने में सफल रहे थे। बाजपट्टी से मंत्री रंजू गीता व सरायरंजन से
मंत्री विजय कुमार चौधरी जरूर जीतने में सफल रहे। दोनों को ही अपने क्षेत्र में
विकास परक योजना लाने का लाभ मिला। नीतीश सरकार और फिर हम के हमसफर बन कर भाजपा के
खाते से टिकट हासिल कर चुनाव लड़ने वाले पूर्व मंत्री नीतीश मिश्रा झंझारपुर से
अपनी परंपरागत सीट को बचाने में विफल रहे। नीतीश मिश्रा को अति आत्मविश्वास यहां
ले डूबा। जदयू से निकल कर हम का हाथ थामने वाले पूर्व मंत्री शाहिद अली खां भी
सुरसंड के चुनावी जंग में मात खा गए। नीतीश सरकार में 2005 में
मंत्री रह चुके हम प्रत्याशी निवर्तमान विधायक अजीत कुमार कांटी से अपनी सीट नहीं
बचा पाए। यहां के लोगों ने निर्दलीय प्रत्याशी अशोक कुमार चौधरी को विधानसभा
पहुंचा कर एक तरह से अजीत को यह एहसास कराया है कि वह उनके पिछलग्गु बनने को तैयार
नहीं हैं।
चुनाव पूर्व माना जा रहा था कि यह इलाका एनडीए के मुफीद रहेगा, लेकिन चुनाव
परिणाम इससे इतर रहा। मुजफ्फरपुर में बीजेपी की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी,
पर परिणाम कुछ और ही कह रहा है। मुजफ्फरपुर शहर और पारू सीट ही
पार्टी बचा पाई। कुढ़नी के रूप में भाजपा के खाते में नई सीट आई, जबकि औराई और गायघाट सीट भाजपा के हाथ से निकल गई। ऐन चुनाव के मौके पर
मीनापुर में जदयू से भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायक दिनेश कुशवाहा के पुत्र अजय
कुमार को मैदान में उतारना भाजपा को भारी पड़ा। वहीं, बरूराज
में राजद का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए ब्रजकिशोर सिंह के पुत्र अरुण कुमार
को टिकट देना भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा। नतीजा, वह हार गए।
पूरे चुनाव परिणाम पर गौर करें तो यह साफ हो गया है कि वोटरों का
मिजाज ठीक- ठीक पढ़ने में हर दल विफल रहा।
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