बात आठ माह पुरानी है। भरी दोपहर में झांसी के शिक्षा भवन प्रांगण में अचानक तीन से चार हजार आदिवासी आ डंटे। मुद्दा था जल, जंगल और जमीन। सभा हुई, वक्ताओं ने सरकारी उपेक्षा की चर्चा की। आदिवासियों और पिछड़ों- दलितों के साथ हो रही नाइंसाफी की बात कही। सभा में उपस्थित भीड़ अपने नेताओं के वक्तव्य पर सहमत थी। आंदोलन को तैयार थी। इस भीड़ का जुटना पूर्वनियोजित था या नहीं, यह संभव है कि इसके आयोजकों को मालूम हो, लेकिन न तो ऐसे किसी आयोजन की जानकारी प्रशासन को थी, न ही सरकारी खुफिया तंत्र को ही इसका पता था। अचानक जुटी भीड़ और इसके बाद हुई सभा ने सबको हैरान कर दिया था। प्रशासन के आला अधिकारियों के पेसानी पर तब चिंता की लकीर जरूर पड़ी थी। चिंता इस बात की नहीं कि भीड़ कहां से आई, इसके आयोजक कौन थे? बल्कि चिंता इस बात की थी कि गरीब- गुरबों को कहीं कोई नक्सली संगठन अपने चंगुल में न फंसा ले। तब बैठकों में बाजाप्ता अफसरों ने अपने मातहतों को दिशा- निर्देश दिए। गरीबों के उत्थान की बातें कहीं, लेकिन ठोस धरातल पर कोई काम नहीं हुआ।
आठ माह पूर्व का वह अंदेशा अब वास्तविकता में बदलता दिख रहा है। महोबा में सप्तक्रांति एक्सप्रेस में शक्तिशाली बम का मिलना हो या मऊरानीपुर में विस्फोट कर पुल उड़ाने का प्रयास हो, यह कहीं न कहीं नक्सली तत्वों के सक्रिय होने की ओर इशारा कर रहा है। अब तो दंतेवाड़ा के नक्सलियों को कारतूस सप्लाई करने में झांसी से दो सिपाहियों के धरे जाने के बाद तो नक्सलियों के तार यहां से साफ- साफ जुड़ते दिखाई देने लगे हैं।
नक्सलवाद फैलने के खतरे को सेना ने भी महसूस किया है। पिछले दिनों सेना के अधिकारियों ने एक बैठक कर प्रशासनिक अधिकारियों को इससे आगाह भी किया है। खुफिया सूचनाओं को आधार मानते हुए सैन्य अफसरों ने तब बताया था कि आस पास के जंगलों में नक्सलवादी और माओवादियों॒ की उपस्थिति को गंभीरता से लेने की जरूरत है। लेकिन इस आसन्न संकट को लेकर सरकार कितनी गंभीर है या उनके नुमाइंदे यानी अफसरों ने कितनी संजीदगी दिखाई है, यह खुली किताब की तरह है। यानी, अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल होती तो नहीं दिख रही है।
इस क्षेत्र में नक्सलवाद की आग को हवा देने के एक नहीं दर्जनों तत्व मौजूद हैं। भूख और बेरोजगारी की समस्या दिनों दिन विकट होती जा रही है। मनरेगा या अन्य योजनाएं घपले- घोटाले का पर्याय होतीं जा रहीं हैं। मजदूरी के नाम पर ठगने वाले जन प्रतिनिधियों की फेहरिश्त लंबी होती जा रही है। शिकायतकर्ताओं को न्याय दिलाने के नाम पर जरूर अफसरों द्वारा आश्वासन दिया जाता रहा है, लेकिन गरीबों की रोटी पर डाका डालने वालों के खिलाफ अब तक कितनी ठोस कार्रवाई हुई है, यह किसी से छिपी नहीं है। ललितपुर में सहरिया आदिवासियों की उत्पीड़न की कथा तो हरि अनंत हरि कथा अनंता की तर्ज पर है। जंगलों में रह कर जीवन यापन करने वाले इन आदिवासियों के साथ होने वाले छल- कपट की कहानियां अखबारों में सुर्खियां बनती हैं तो वोट के सौदागर उनकी पीठ सहलाने को पहुंच जाते हैं, लेकिन उनके उत्थान की दिशा में या यूं कहें कि समाज की मुख्य धारा में उन्हें जोड़ने की दिशा में कोई पहल नहीं होती। इसके लिए सिर्फ आज के राजनेताओंको दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि आजादी के बाद से ही इन आदिवासियों की आंखों से आंसू पोंछने को कोई नहीं आया। आज भी जंगलों में जड़ी- बूटियां तलाशना उनका मुख्य पेशा है। हालांकि, यहां भी माफिया तत्वों के सक्रिय होने के कारण उनके लिए पेट भरना मुश्किल हो रहा है। जंगल से बाहर निकल कर श्रम के जरिए पेट भरने की कोशिश में जुटे इन आदिवासियों का यहां भी कम शोषण नहीं होता। इस पूरे इलाके में उद्योग धंधे के नाम पर एक बड़ा शून्य है। यानी, यहां वह सब कुछ है जो नक्सलवाद की पड़ चुकी (?) बुनियाद को हरा- भरा करने के लिए काफी है। वैसे भी हमारे हुक्मरानों ने अपने रवैये से उनकेलिए मैदान तैयार कर दिया है। अब वह अपना असली खेल कब से शुरू करेंगे, यह उन पर पूरी तरह से निर्भर है।
कुमार भवानंद
Thursday, July 22, 2010
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नक्सलवाद के लिए पूरा देश ही उपजाऊ प्रतीत हो रहा है।
ReplyDeletenaksalvad ki samsya door karne ke liye sarkar ko dridh ichhashakti ka parichay dena hoga. abhi aisa nahi lagta hai.
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