Wednesday, October 30, 2013
Monday, October 7, 2013
याद आ गई बचपन की
तब जन्मदिन हमारे घर में इस तरह नहीं मनाया जाता था, जैसा आज मैं अपनी बेटी अनुष्का सृष्टि या अभिनव आनंद का मनाता हूं। या मेरे जैसे अन्य अभिभावक मनाते हैं।
यानी न तब केक कटते थे और न ही हैप्पी बर्थ डे... का सामूहिक गान होता था। न ही सिर पर कैप लगाए बच्चे नजर आते थे। और तो और गिफ्ट और रिटर्न गिफ्ट का कल्चर भी
नहीं था। अपने जन्म दिन को लेकर मुझे जो पहली याद है, उसे आप जानेंगे तो कहेंगे अरे यह कैसा जन्मदिन उत्सव। तब केक के लिए घर में कोई स्थान नहीं था। हां, खीर
जरूर बनती थी। सबसे पहले भगवान को इसका भोग लगता था। दादाजी स्व. गंगा दत्त झा (मेरे दादा स्व. पंडित यादव चन्द्र झा के छोटे भाई) ने गांव के आंगन में भगवान की पूजा की थी।
मैंने तब नई पैंट-शर्ट पहनी थी। इससे पहले मां ने खूब रगड़- रगड़ कर स्नान कराया था। पूजा शुरू हुई तो दादी ने कहा - बैठ जाओ। पूजा के बाद मैंने सभी को प्रणाम किया।
दादी ने खीर की बड़ी सी प्लेट मुझे दी। और मन गया मेरा जन्मदिन। कालेज में आने पर जरूर इस दिन मैं अपने कुछ दोस्तों को घर पर बुलाता था, सभी लोग रात का खाना साथ खाते थे।
इसे दोस्तों को घर पर खाना खिलाने का एक बहाना समझ लीजिए। आप यह पढ़कर जरूर मुस्करा सकते हैं कि मैंने अपने जन्मदिन पर पहली बार केक तब काटा, जब कार्यालय (अमर उजाला) में किसी भी साथी के बर्थ डे पर केक काटने की नई परंपरा शुरू हुई। केक काटने का यह पहला सौभाग्य तब मिला जब मैं अपने जीवन के चौथे दशक को छू चुका था। है न मजेदार बात। यह तो थी मेरी बात, लेकिन जिस बर्थ डे की बात मैं आपसे शेयर कर रहा हूं, वह कम रोचक नहीं है। 22 सितंबर 2013 की दोपहर मैं मेरी पत्नी रश्मि और दोनों बच्चे आमंत्रित थे झांसी से करीब 15 किलोमीटर दूर एक गांव मेंजहां आयोजित होना था एक अनूठा बर्थ डे। यह बर्थ डे महिका का था। चार साल की इस बच्ची के जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए उसके पिता संजय पचौरी जी ने न केवल अपना पसीना बहाया था, बल्कि शहर में पले बढ़े बच्चों को ग्रामीण परिवेश से बावस्ता कराने के लिए उन्होंने खर्च भी खूब किए थे। टीका से स्वागत। चना घुघनी का स्वाद तो अपने गांव सरीखा। हां, उन्होंने वहां एक कुम्हार को भी बुला रखा था, जो मिट्टी के बर्तन बना कर बच्चों को अपनी कला से परिचय कराने के साथ- साथ उनका मनोरंजन भी कर रहा था। एक खास बता बताऊं.... उन्होंने अतिथियों की दाढ़ी बनवाने के लिए एक नाई को भी बुला रखा था, जो बाल- दाढ़ी बनाने के साथ- साथ बातें भी खूब बना रहा था। ठीक वैसे ही जैसे हमारे गांव का भरतलाल नाई बनाया करता था। और भी बहुत कुछ था, जो गांव की याद दिला रहा था। इस दौर में जन्मदिन पार्टी का यह रूप नि:संदेह यह इशारा करने को काफी है कि भले ही आजीविका के लिए हम शहरों की खान छान रहे हों, लेकिन आज भी दिल तो वहीं बसा है....अपने छोटे से गांव में .... मेरे लिए बभनी....आपके लिए कोई और नाम होगा।
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एक जन्म दिन ऐसा भी....। जो याद दिला गई एक बार फिर बचपन की। जब मैं बिहार के
पूर्णिया जिले में स्थित अपने गांव बभनी में रहा करता था।तब जन्मदिन हमारे घर में इस तरह नहीं मनाया जाता था, जैसा आज मैं अपनी बेटी अनुष्का सृष्टि या अभिनव आनंद का मनाता हूं। या मेरे जैसे अन्य अभिभावक मनाते हैं।
यानी न तब केक कटते थे और न ही हैप्पी बर्थ डे... का सामूहिक गान होता था। न ही सिर पर कैप लगाए बच्चे नजर आते थे। और तो और गिफ्ट और रिटर्न गिफ्ट का कल्चर भी
नहीं था। अपने जन्म दिन को लेकर मुझे जो पहली याद है, उसे आप जानेंगे तो कहेंगे अरे यह कैसा जन्मदिन उत्सव। तब केक के लिए घर में कोई स्थान नहीं था। हां, खीर
जरूर बनती थी। सबसे पहले भगवान को इसका भोग लगता था। दादाजी स्व. गंगा दत्त झा (मेरे दादा स्व. पंडित यादव चन्द्र झा के छोटे भाई) ने गांव के आंगन में भगवान की पूजा की थी।
मैंने तब नई पैंट-शर्ट पहनी थी। इससे पहले मां ने खूब रगड़- रगड़ कर स्नान कराया था। पूजा शुरू हुई तो दादी ने कहा - बैठ जाओ। पूजा के बाद मैंने सभी को प्रणाम किया।
दादी ने खीर की बड़ी सी प्लेट मुझे दी। और मन गया मेरा जन्मदिन। कालेज में आने पर जरूर इस दिन मैं अपने कुछ दोस्तों को घर पर बुलाता था, सभी लोग रात का खाना साथ खाते थे।
इसे दोस्तों को घर पर खाना खिलाने का एक बहाना समझ लीजिए। आप यह पढ़कर जरूर मुस्करा सकते हैं कि मैंने अपने जन्मदिन पर पहली बार केक तब काटा, जब कार्यालय (अमर उजाला) में किसी भी साथी के बर्थ डे पर केक काटने की नई परंपरा शुरू हुई। केक काटने का यह पहला सौभाग्य तब मिला जब मैं अपने जीवन के चौथे दशक को छू चुका था। है न मजेदार बात। यह तो थी मेरी बात, लेकिन जिस बर्थ डे की बात मैं आपसे शेयर कर रहा हूं, वह कम रोचक नहीं है। 22 सितंबर 2013 की दोपहर मैं मेरी पत्नी रश्मि और दोनों बच्चे आमंत्रित थे झांसी से करीब 15 किलोमीटर दूर एक गांव मेंजहां आयोजित होना था एक अनूठा बर्थ डे। यह बर्थ डे महिका का था। चार साल की इस बच्ची के जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए उसके पिता संजय पचौरी जी ने न केवल अपना पसीना बहाया था, बल्कि शहर में पले बढ़े बच्चों को ग्रामीण परिवेश से बावस्ता कराने के लिए उन्होंने खर्च भी खूब किए थे। टीका से स्वागत। चना घुघनी का स्वाद तो अपने गांव सरीखा। हां, उन्होंने वहां एक कुम्हार को भी बुला रखा था, जो मिट्टी के बर्तन बना कर बच्चों को अपनी कला से परिचय कराने के साथ- साथ उनका मनोरंजन भी कर रहा था। एक खास बता बताऊं.... उन्होंने अतिथियों की दाढ़ी बनवाने के लिए एक नाई को भी बुला रखा था, जो बाल- दाढ़ी बनाने के साथ- साथ बातें भी खूब बना रहा था। ठीक वैसे ही जैसे हमारे गांव का भरतलाल नाई बनाया करता था। और भी बहुत कुछ था, जो गांव की याद दिला रहा था। इस दौर में जन्मदिन पार्टी का यह रूप नि:संदेह यह इशारा करने को काफी है कि भले ही आजीविका के लिए हम शहरों की खान छान रहे हों, लेकिन आज भी दिल तो वहीं बसा है....अपने छोटे से गांव में .... मेरे लिए बभनी....आपके लिए कोई और नाम होगा।
Kumar Bhawanand
Jhansi
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